1.
“4 अप्रैल, 2011”
मेरा एक मित्र हुआ करता था उन दिनों, मतलब आज भी है, भूषण नाम है उसका। स्कूल में हम भुटु बुलाते थे उसे। एक सुबह विद्यालय के प्रांगण में, जहां प्रार्थना सभा होती थी, भुटु मेरे पास आता है और कहता है मुझसे,
‘भाई, तूने सुना? हमारे सेक्शन में एक नई लड़की का दाखिला हुआ है, नाम तो नहीं पता, पर उसके पापा मेरे पापा के साथ ही, एक ही विभाग में हैं, अभी हाल ही में तबादला हुआ उनका Nasik में। कल रात उसके पिताजी हमारे घर आये थे, तभी मालुम हुई यह बात।’
कोई ख़ास दिलचस्पी न लेते हुए मैंने कहा, ‘क्या सच में?’
भुटु, ‘हाँ यार, ऊपर से बंगाली भी है।’
मुझे उसकी यह बात पिछली बात से कुछ रोचक लगी।
‘अच्छा? उसका नाम क्या है?’
‘नाम तो याद नहीं आ रहा यार, पापा ने बताया तो था, अजीब सा था कुछ’।
‘छोड़, असेंबली के बाद वैसे भी क्लास में अटेंडेंस होगी ही, तब पता लग जाएगा।’
‘हाँ भाई, सही कहा!’
लड़कों की बुद्धि स्वतः तेज़ चलने लगती है इन सब मामलों में। ख़ैर, असेंबली के बाद क्लास तक जाते-जाते मैं बिलकुल ही भूल चुका था की हाजिरी लगाते वक़्त मुझे ध्यान देना है, उस नई लड़की का नाम जानने के लिए, जिसका भुटु ने ज़िक्र किया था। हमारी क्लास-टीचर, रीना जी आईं और कहा, ‘गुड मॉर्निंग चिल्ड्रन’ । इसके तुरंत बाद ही उन्होंने नाम पुकारना शुरू किया।
‘… रोल नंबर १४ – प्रेज़ेंट मैम, १५ – प्रेज़ेंट मैम, १६ – यस मैम… ‘
मैं जैसे ठिठक गया! हाँ, रोल क्रं १६ के उस ‘यस मैम’ को सुनना, जैसे कोई अलौकिक एहसास था मेरे लिए। जैसे किसी ने भीतर का वह तार छेड़ दिया हो, जो वर्षों से अनछुआ पड़ा हुआ था। मैं अनजाने में उठता हूँ और मुड़ता हूँ उस ध्वनि के उद्गम की तरफ़। मुझे दिखता है कक्षा के दाहिनी छोर के दीवार से लगी एक बेंच में, किसी अपरिचित लड़की के बैठे होने की स्पष्ट रूपरेखा। मेरे परिपेक्ष्य से केवल उसके सिर का हेयर-बैंड और उसके कंधे के ऊपर तक के बाल दिख रहे थे। मैं सोचने लगा, ‘जिसका कंठ ही इतना मधुर हो, उसका रूप-सौंदर्य तो दिव्य होगा ही। नाम भी खूबसूरत होगा।‘
मन कुछ उतावला सा हुआ, धैर्य साथ छोड़ रहा था। जैसे ही रीना जी की क्लास ख़त्म हुई, मैं तुरंत ही जा पहुंचा दाहिनी छोर के दीवार से सटे उस कमबख़्त बेंच के पास। मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसके बेंच के पास जाकर, मुझे पहली बार दिखता है उसका चेहरा! इतने वर्षों के सिलसिले की उत्पत्ति, बस उस एक झलक से हुई थी। किसी नई, अनजान जगह पर आपका आचरण अपने आप बदल जाता है। आप अपनी स्वाभाविक स्वरुप में नहीं रहते हैं, खुल नहीं पाते हैं। अजनबियों के सामने, हम खुद भी तो अजनबी ही होते हैं न? अगर मालूम होता मेरे हाथ की रेखाओं में, उसका ठहराव कुछ महीनों भर का ही है, तो मैं यह कभी न पूछता जो अब पूछने वाला था।
‘Hi! मैं आरुष, तुम कहाँ से आई हो?’
कुछ देर तक एक शांति सी छायी रहती है, मैं दुबारा पूछने ही वाला होता हूँ की, Pooja जो बैठी थी ठीक पीछे वाली बेंच पर, कहती है, ‘बागडोगरा से आई है’।
मुझे उत्तर की तलाश थी तो सही, मगर मैं उस कंठ को फिर से सुनना चाहता था, जिसने पहली बार में ही सम्मोहित कर लिया था मुझे, और मैं Pooja से कहता हूँ, ‘उसे बोलने दे!’
‘कहाँ से आई हो तुम?’, मैंने फिर पूछा।
‘सुना नहीं उसने क्या बोला?’…
यह था मेरे पहले प्रश्न का उसका पहला जवाब।
सवाल का जवाब सवाल भी हो सकता है, उस दिन भली-भाँती समझ गया था मैं। मुझे अच्छा तो नहीं लगा, पर बुरा भी नहीं माना मैंने उस टेढ़े से उत्तर का। ऐसा उत्तर पाने के पश्चात, मैं समझ गया था की उसका नाम उसी से पूछना, ठीक न होगा। इसलिए तुरंत ही पीछे बैठे Pooja से पूछा मैंने, ‘और नाम क्या है?’
‘अनुश्रुति’, Pooja ने बताया।
‘वाह! यह तो बड़ा ही अनोखा सा नाम है, पहली बार सुन रहा हूँ।’
Pooja ने यह सुनने के बाद इशारों में मुझे समझा दिया की मैं कुछ समय के लिए वहाँ से चला जाऊँ। शायद सही ही किया उसने, पता नहीं फिर कौनसी बात बुरी लग जाती श्रुति को। आने वाले सालों में अनुश्रुति सिर्फ़ श्रुति ही कहलाई गई। Pandey, Pooja, Rohit, Ankit, Souvik के ज़माने में, कहाँ अनुश्रुति कहने वाला था कोई?
जीवन में जो भी घटित होता है, जब वे घट रहे होते हैं, हमें उन घटनाओं की अहमियत बिलकुल ही मालूम नहीं होती। कोई बात कितनी अहम है, किसी बीत रहे वाकये का कितना गहरा असर हो सकता है आगे ज़िन्दगी में, इसकी हमें ख़बर नहीं होती। शायद ज़िन्दगी के असूल कुछ इसी तरीक़े से काम करतें हैं, चुपचाप। बिना कोई शोर किये, बग़ैर किसी हंगामे के, जिसे जब होना होता है, हो जाता है। हम कुछ पल के लिए बिगड़ते भी हैं, की जो हुआ, ज़रा जल्दी हुआ; या कुछ देर बाद होता, तो ठीक रहता। मगर धीरे-धीरे, समझ में आता है, की जो हुआ, जैसे भी हुआ, ठीक ही था। ज़िंदगी को कौन समझ पाया है? कोई भी तो नहीं! सब कोशिश करते हैं समझने की, ज़िंदगी को… ज़िंदगी भर… बस।
बात कुछ-कुछ होने लगी है अब, जहाँ मुझे देखकर वह शुरुआती दिनों में कुढ़ जाया करती थी, अब मुस्कुरा देती है. कभी कभी हंसाता हूँ, तो हंसती भी है. इंसान की मनोस्थिति जानने के लिए आप उसे हंसा कर देखिये, अगर वह हँसता है तो समझ जाइये सब ठीक है, अगर नहीं हँसता, फिर उसके न हंसने को संकेत समझिये, इस बात का की या तो वह आपसे ख़फ़ा है, या उसकी आप में दिलचस्पी ज़रा कम है.
“15 अप्रैल, 2011“
कुछ तारीख़ें ज़हन में ऐसे छप जातीं हैं, जैसे वे आप ही का एक हिस्सा हों! इस “15 अप्रैल” को मेरी ज़िंदगी में एक ही बार आना था, सो आया। उसे मैं ताउम्र अपने साथ रख लूँगा, इसका इल्म, इसका एहसास मुझे तब न था। बिलकुल भी नहीं। 9 साल पहले आज ही की रात, मैं एक पार्टी में शरीक हुआ। मेरे कैंपस में बंगालियों की एक समिति बनी हुई थी, जो समय समय पर अलग अलग आयोजनों का प्रबंध किया करती थी। मसलन, ‘दुर्गा पूजा’, ‘काली पूजा’, ‘सरस्वती पूजा’, ‘लक्ष्मी पूजा’, ‘नववर्ष’, ‘पोइला बोइशाख‘, ‘किसी के जन्मदिन’, आदि अवसरों पर दावत बुलाई जाती थी। बंगाल से दूर रहकर बंगाल में रहने जैसा महसूस करना, अच्छा लगता था। ऐसी जगहों पर अगर आपके जान पहचान का कोई मित्र न हो, तो मन लगता ही नहीं। मैं अगर अपनी बात करूँ, आज भी जब ऐसी किसी स्थिति में फंसता हूँ, सीधे घर भागता हूँ, और जब तक भोजन का समय नहीं हो आता, वापस नहीं जाता। ये पार्टी, जिसका मैं ज़िक्र कर रहा हूँ, “पोइला बोइशाख” के मौके पर आयोजित की गई थी। “पोइला बोइशाख”, यानी वैशाख माह का पहला दिन, बंगाल के लोग इसी दिन से अपना नया साल शुरू करते हैं। मेरा एक घनिष्ठ मित्र, भूषण, जो मेरे ही साथ एक ही स्कूल में पढ़ता था, संयोगवश बंगाली भी था। उसके इस पार्टी में आ जाने से मुझे बोरियत महसूस नहीं हुई। मुझे बैंगलोर आए तब बमुश्किल 5 ही महीने हुए थे, अतएव मैं भूषण के साथ कैंपस के बाकी हमउम्र लोगों से जान-पहचान बढ़ाने में व्यस्त हो गया। एक ने किसी नए गाने का ज़िक्र किया, कहा डाउनलोड करके सुनना, ईयरफोन्स लगाके, ‘फ़ील आती है‘। वहीँ किसी ने ‘PC गेम्स‘ की बात छेड़ दी, कि कैसे ‘FIFA 11’ में पहली बार गोलकीपर को भी खेलने कि सहूलियत थी, इस पर किसी ने ‘कॉल ऑफ़ ड्यूटी – MW2′ के सबसे मुश्किल मिशन को पार करने के सुझाव दिए, किसी ने ‘NFS – हॉट परसूट‘ के गेमप्ले का वर्णन दिया। बातों बातों में भूषण ने सबसे कह दिया कि मैं गाता हूँ, मुझसे तुरंत कहा गया कुछ गाने को। मैं, जो कि अब तक चुप-चुप सा ही खड़ा था, अकस्मात् भूषण कि तरफ़ देखता हूँ। जैसे मेरी आँखें उससे पूछ रहीं हों, ‘क्यों भाई? ये बोलना इतना ज़रूरी था?’।
सच कहूँ तो मुझे अजीब लग रहा था, अपिरिचित या कम परिचित लोगों के सामने अपना परिचय गा कर देने में। मैंने टालने के लिए कह दिया,
‘कुछ ही देर बाद अंदर हॉल में मेरा प्रदर्शन है। वहाँ सुन लीजियेगा सब। अभी कृपया क्षमा करें!‘
उन्होंने बहुत ज़ोर दिया, पर मैं कब मानने वाला था। थोड़े समय उपरांत मुझे माँ ने बुलाया, परफॉरमेंस का वक़्त हो आया था। साथ के बाकी लोग भी हॉल के अंदर चल दिए। मैं सत्यजीत रॉय द्वारा रचित ‘आहा की आनन्दो आकाशे बाताशे‘ लेकर श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत हुआ। लोगों को बहुत पसंद आया, जिन्होंने कुछ देर पहले मुझसे गीत सुनने की इच्छा व्यक्त की थी, वे सब बाहर आकर कहने लगे, ‘भाई, अच्छा गाता है, कहीं ट्राय क्यों नहीं करता‘, ‘तू फाड़ देगा‘, ‘मुंबई जाएगा तू‘, और इसी प्रकार की नाना प्रशंसनीय बातें कहकर सबने मुझे कृतज्ञित किया।
सहसा मुझे अपना नाम सुनाई पड़ता है, मैं अनायास ही पीछे मुड़ता हूँ, देखता हूँ श्रुति अपने बहन के साथ खड़ी है!
‘बड़ा अच्छा गाते हो तुम तो, मुझे मालूम नहीं था, कभी सुना ही नहीं तुम्हें गाते हुए।’, उसने कोमलता से कहा।
श्रुति को इस तरह अचानक सामने देखकर मेरी आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं, मुँह खुला का खुला रह गया, हथेलियां भीगने लगीं, लगने लगा जैसे अब गिर जाऊँगा। मैंने हिम्मत जुटाई और एक खाली सा घूँट पीकर कहा,
‘शुक्रिया, जानकर ख़ुशी हुई की तुम्हें अच्छा लगा वह गीत। गाना ज़रा पुराना है पर पर बड़ी ही प्यारी रचना है। तुम आई कब वैसे? मुझे दिखी ही नहीं तुम।’
‘मैं तो बहुत देर से यहीं हूँ, तुम ढूंढ रहें थे क्या?’
‘नहीं मतलब… ‘
मेरी बात पूरी भी न हो पाई थी की उसकी बहन उसे खींचकर दूर ले जाती है। उसके वहाँ से चले जाते ही मेरे आस पास की हवा में एक अव्यक्त-सी शिथिलता छा गई, यूँ लगा मानो किसी चांदनी रात में पेड़ खड़े-खड़े स्वप्न देख रहें हों। भूषण शायद यह सब देख रहा था दूर से ही, वह पास आकर चुटकी लेता हुआ कहता है,
‘क्या बात है आरुष बाबू, क्या देख रहा हूँ मैं यह सब?’
‘भूषण, कभी किसी लड़के को किसी लड़की से बात करते हुए नहीं देखा क्या?’
‘अरे! तू संजीदा क्यों हो रहा है?’
‘तू मज़ाक कर रहा है मतलब?’
‘हाँ मेरे भाई, क्या तू भी’
मैं अंदर ही अंदर यह जानता था, की न मैं संजीदा हुआ था, और न भूषण मज़ाक कर रहा था। मन की बातें अगर जल्दी उजागर हो जाएँ, तो ये बिलकुल किसी आग की तरह ही फैलती हैं। और आग का स्वभाव होता है, ‘जलाकर राख कर देना’।
2.
स्कूल में समय-समय पर श्रुति से बात हो जाती है, ज़्यादा तो नहीं क्योंकि मैं ज़ाहिर नहीं करना चाहता हूँ अपनी मन की बातें और भावनाएँ औरों के समक्ष, इतनी शीघ्र। इस तरह संयम बनाकर रखने के पीछे का एक और कारण यह भी था की, विगत वर्षों में, जब कुछ छोटा था मैं और हम सपरिवार जोधपुर में रहते थे, अपने ही कक्षा की कुछ लड़कियों से बात करने में मुझे अच्छा लगता था। मन करता था वे मुझे देखें, मैं उनकी आँखों में हर पल समाया रहूँ। उन्हें किसी चीज़ की ज़रुरत पड़े, तो वे मुझे बुलाए, किसी सहायता की दरकार हो, तो सबसे पहले मुझे बताएँ। बाल्यकाल का बचपना कहूँ इसे, या मेरा स्वभाव, नहीं बतला सकता। श्रुति से बात करने के उपरांत जो अनुभूति मुझे होती थी, मेरे मनोभाव की जो स्थिति थी, इनसे मेरा परिचय पहले भी हो चुका था।
यह अनुभूति, कभी अपने चरम तक पहुँच ही नहीं सकी थी। वह पहली लड़की, जिसकी नज़रों में आने की मैंने भरसक कोशिश की थी , हमारी मुलाक़ात के कुछ महीनों बाद ही उसके पिताजी का स्थानांतरण हो गया, तब मैं पाँचवी कक्षा में था। दूसरी जिस बाला ने मेरा ध्यान आकर्षित किया, उसने दुर्भाग्यवश अकेले मेरा ही नहीं, और भी कईयों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था। जैसे एक होड़ लगी थी, की कौन अनुष्का की नज़रों में पहले आ जाए। हम में से किसी एक से अगर अनुष्का मदद की गुहार लगाती, तो सभी दौड़ पड़ते, और जिसे वह अवसर प्राप्त होता, वह बाकियों को जलाता, चिढाता। इतनी स्पर्धात्मक से परिवेश में, मेरा दूर हट जाना ही मुझे हितकर लगा।
“June, 2011”
अब श्रुति को कभी-कभी तंग करता हूँ, मसलन वह क्लास में कुछ लिख रही है, और मैं उसकी कॉपी लेकर फुर्र हो गया, या क्लास टेस्ट में उसने जितने अंक पाए, उन्हें बोर्ड पर लिख दिया। मैं अब श्रुति के ठीक पीछे वाली बेंच पर बैठता हूँ जहाँ से उसे परेशान करने में सहूलियत होती है। ऐसा नहीं है की उसे छेड़कर, या क्रुद्ध कर, मुझे अच्छा लगता था। उसके चेहरे के बदलते हावभाव और माथे पर उभरते शिकन को देख पाना ही, उसे परेशान करने के पीछे के उद्देश्य थे। मैं लोगों से बात करने में वैसे भी कतराता था, श्रुति से बात करने में तो पसीने छूट जाते थे। कदाचित, उसके जज़्बातों को टटोलना मेरे लिए अलौकिक था, दो आत्माओं का मिलन कैसे संभव है, अगर परस्पर उन आत्माओं के बीच कोई स्पर्श ही न हो? श्रुति को मैं इसलिए भी सताता था, क्योंकि अपने भावनाओं का प्रकटन, मुझे ठीक तरीके से कभी आया ही नहीं, अब भी नहीं आता। उसे खीझाकर कुछ कहे बिना ही जितनी अनकही बातें अप्रत्यक्ष रूप से हो सकती थीं, किया करता था। मगर इन सबके बीच, उसका पक्ष मैंने कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया, उससे कभी यह नहीं पूछा कि क्या उसे बुरा लगता है, मेरा इस तरह से पेश आना? मैं नहीं जानता था कि मेरा श्रुति को तंग करना, भविष्य में उठने वाले तूफ़ान को और उग्र कर देगा। नहीं ज्ञात था कि जिस स्वप्न को मैं दिन पर दिन बुन रहा था, आखिर के दिनों में मैं स्वयं ही सब पलक झपकते ख़त्म कर देने का कारण बन जाऊँगा। कि सब इतनी तेज़ी से समाप्त होगा, जितनी तेज़ी से माँ कोई पुराना बुना हुआ स्वेटर खोल देतीं हैं, ऊन का आख़िरी धागा पकडकर।
एक रोज़ श्रुति अपने डेस्क पर बैठ सामाजिक विज्ञान की क्लासवर्क कॉपी से कुछ पढ़ रही थी, ज़रा देर बाद देखता हूँ कि वह अपनी सहेली के साथ कहीं बाहर चली जाती है। मौका देखकर मेरे खुराफ़ाती दिमाग ने मुझसे कहा, ‘वह कॉपी रख लेता हूँ, आकर जब ढूँढेगी इधर-उधर, बड़ा मज़ा आएगा!‘
थोड़ी देर बाद वह आती है, और जैसा मैंने सोचा था, वह उस कॉपी कि तलाश करने में जुट जाती है। मैं उसे यह सब करते हुए देखता रहता हूँ, और मन ही मन ऐसा प्रसन्न होता हूँ, जैसे संसार भर का सुख, मुझे मिल गया हो! वह कुछ उतावली सी हो सामने अपने सखियों से पूछती है,
‘क्या किसी ने मेरी सोशल साइंस कि कॉपी देखी, यहीं रखी थी यार, मिल नहीं रही।‘
सब जैसे एक सुर में बोल उठते हैं, ‘नहीं यार, हमने तो नहीं देखी…‘
श्रुति अब पीछे मुड़ती है जहाँ सिर्फ़ मैं ही बैठा हुआ था। मेरी तरफ़ देखती है, और वही सवाल फिर से दोहराती है,
‘आरुष, क्या तुमने ली है कॉपी?’
मैं, जो कि अब तक अभिनय कर रहा था कुछ पढ़ने का, उसकी तरफ़ सुस्ती से देखता हूँ,
‘नहीं यार, मैंने तो नहीं ली।‘
‘सच कह रहे हो?’
‘मैं भला झूठ बोलकर तुम्हें परेशान क्योंकर करने लगा श्रुति?’
‘अच्छा? तो मुझे तुम्हारे अलावा और कौन परेशान करता है?’
‘कोई नहीं।‘, मैं जैसे इतना कहते ही फँस गया, श्रुति को अब बिलकुल भरोसा हो चुका था कि मैंने ही ली थी कॉपी, वह अपनी जगह पर बैठ जाती है।
‘चलो लाओ, बातें न बनाओ ज़्यादा‘
‘हाथ पीछे करो, और ले लो कॉपी!‘
साधारणतः, विद्यालय में जो डेस्क होते हैं, उनकी लंबाई बेंच के ऊपर तक की ही होती है, इसलिए आगे बैठा हुआ छात्र / छात्रा अगर पीछे मुड़कर देखे, तो उसे पीछे बैठे हुए छात्र / छात्रा का धड़(torso) ही दिख पाता है। मैंने उसकी कॉपी अपने हाथ में ली, और डेस्क के नीचे रख लिया।
‘हाथ बढ़ाओ, और ले लो‘
‘देखो आरुष, दे दो न…‘
‘नहीं, तुम ऐसे ले सकती हो तो बेशक ले लो, अन्यथा, मैं तो देने से रहा‘
उसके चेहरे पर वही शिकन, जिसका मैंने ज़िक्र किया था, फिर से उभर आता है। और मुझे जैसे दिख जाता है अपना तीर्थ स्थल। वह हाथ बढ़ाती है, मैं कॉपी कुछ और नीचे कर देता हूँ, वह थोड़ा और बढ़ाती है, मैं थोड़ा और नीचे रख लेता हूँ। मेरे मन में एकाएक एक विचार आता है, मैं तुरंत कॉपी हटा कर अपना दायाँ हाथ रख देता हूँ, श्रुति मेरा हाथ पकड़ लेती है! उसे शीघ्र ही ये एहसास हो जाता है कि उसने मेरा हाथ पकड़ लिया है, तुरंत अपना हाथ खींचती है, मेरे हाथ में उसका छुवन, उसका स्पर्श रह ही जाता है।
‘तुम पागल हो क्या?’
‘नहीं बिलकुल नहीं‘, ये कहकर मैं ज़रा सा मुस्कुरा देता हूँ। वह भी भीनी सी मुस्कान लिए आँखें नीचीं कर, सामने कि तरफ़ मुड़ जाती है। शर्म के मारे उसके कपोल गुलाब कि भाँती लाल हो जाते हैं।
मैं हँसते हुए पूछता हूँ, ‘कॉपी नहीं लेनी?’
वह पीछे मुड़कर मेरे हाथ से झट से कॉपी ले लेती है। मैं देखता हूँ, उसकी आँखें तब भी नीचीं ही थीं!
कक्षा में साथ पढ़ रहे बच्चों को अब तक कुछ-कुछ अंदाज़ा हो चला था, कि कुछ तो बात है जो आरुष श्रुति के पीछे लगा रहता है हर वक़्त। भूषण को भी शक होने लगा था, पर मैं टालता ही गया। रहस्योद्घाटन जितनी देरी से हो, उतना ही अच्छा है। श्रुति नई थी कक्षा में, Nasik में आए अभी उसे कुछ महीने ही हुए थे। इतनी जल्दी अगर उसका नाम किसी के साथ जोड़ दिया जाता, तो मेरे मुताबिक एक दसवीं श्रेणी की लड़की के लिए इस चीज़ को समझ और संभाल पाना, दोनों ही बहुत मुश्किल हो जाता। ऐसा नहीं है की लड़के सँभालने और समझने में मुखर होते हैं, लड़के भी टूटते हैं, मगर, लड़कियाँ स्वभाव से ही फूल-सी कोमल होती हैं, और फूल खिले रहे, तो ही अच्छे लगते हैं। इतनी बुद्धि, तो मेरे अंदर थी नहीं उस वक़्त, पर शायद नियति में यही लिखा था, कि मैं अतिशीघ्र किसी से अपने मन की बातें उजागर न करूँ। सो मैंने कई दिनों तक किसी से कुछ नहीं कहा।
भूषण और मैं, बीते कुछ वक़्त में बड़े जिगरी से हो गए थे। कारण यह नहीं था की वह भी बंगाली था, कारण यह था की हमारी रुचियाँ, एक सी थीं। हमारे शौक भी, एक से थे। लिखना, गाने सुनना, डाँट खाना शिक्षिकाओं से(हाँ, ग़ौरतलब है की दसवीं श्रेणी में हमें किसी भी शिक्षक से पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, सारी शिक्षिकाएँ ही थीं)। एक रोज़, दिन की अंतिम क्लास लाइब्रेरी की लगी। चूँकि वापस आकर सबको जल्दी से निकलना होता था स्कूल से, सब अपनी किताबें समेटने और बैग बंद करने में लग गए। आज बुधवार भी है, किताबें इश्यू करवाने का दिन। सबने अपनी लाइब्रेरी कार्ड ली, और क्लास से बहार निकलने लगे एक-एक कर। भूषण भी तैयार हो गया निकलने को। मैं तभी देखता हूँ कि श्रुति अपने बोतल से पानी पी रही है… मैं उसे देखता रहता हूँ… एकटक! उसे मुँह लगा कर पानी पीने की आदत थी। उसने थोड़ा पानी पीया, बस गले को भिगाने जितना, और बोतल बंद कर के अपनी दोस्त के साथ निकल गयी लाइब्रेरी की तरफ़। पता नहीं क्यों, पर उसके जाते ही मैं उसके बैठने की जगह तक गया, और उसके बैग से उसकी जूठी बोतल निकालकर पानी की २ घूँट पी गया। भूषण सब देख रहा था, मगर इस बार उसके किसी टिपण्णी से पहले ही मैं बोल पड़ा,
“इसी को अगर प्यार में होना कहते हैं, तो हाँ भूषण, मैं प्यार में हूँ।”
भूषण की आँखें बड़ी बड़ी हो आईं थीं, उसे अब अपनी शंकाओं का उत्तर मिल चुका था।
“शाब्बाश मेरे शेर! क्या खूब ख़बर सुनाई है, अब तो ढिंढोरा पीटूँगा। मुझे तो बहुत पहले से पता था, तेरे मान लेने का इंतज़ार था बस!”
“किसी से कहना मत, पर सच यार, बड़ा अच्छा लग रहा है। लग रहा है जैसे अभी रो पडूँगा।”
“अरे ना भाई ना! अभी खुश होने के दिन हैं, रोने के दिनों को आनेवाले कल के लिए छोड़ दे।”
“क्यों, ऐसा क्या होने वाला है आने वाले कल में?”
“मैं तो नहीं बता सकता, यह वह आने वाला कल ही बताएगा!”
मैं भूषण के साथ, उसकी कही बात पर गौर करता हुआ, लाइब्रेरी की तरफ़ चल देता हूँ। वहाँ पहुँचकर देखता हूँ की हम ज़रा देरी से पहुँचे हैं। रेड्डी सर, जो हमारे विद्यालय के लाइब्रेरियन थे, मुझे और भूषण को अपनी टेबल के पास बुलाते हैं,
“व्हाय आर यू लेट?”
“सर सुधा मैम कॉल्ड अस!”, भूषण बोल पड़ता है।
मैं उसकी तरफ़ देखता हूँ, और मन ही मन अंग्रेज़ी में ही कहता हूँ, “ब्रो, वी सीरियसली नीड टु वर्क अपॉन दी एक्सक्यूसेस वी गिव।”
सर कहते हैं, “आई विल आस्क हर…!”
“श्योर सर।”, इस बार मैं बोलता हूँ और अब भूषण मुझे देख रहा है।
रेड्डी सर को शायद अब तक यह बात समझ आ गई थी कि हम झूठ बोल रहे थे। उन्होंने कहा, “ओके देन, गो एंड हैव योर सीट्स।”
मैं सर के टेबल से आज का अख़बार लेकर एक एकांत सी जगह देखकर बैठ जाता हूँ। भूषण के शौक़ बड़े थे, वह कोई मैगज़ीन लेकर मेरे पास आकर बैठ जाता है।
“अगर कल सुधा ने पकड़ा, तो बड़ी बेइज़्ज़ती होगी।”
“अरे तू क्यों सोच रहा है इतना, कुछ भी नहीं होगा, ऐसी बातें किसी को याद भी नहीं रहेंगीं, ऊपर से रेड्डी सर को तो बिलकुल नहीं, उम्र तो देख उनकी, ऐसी उम्र में इंसान चीज़ें भूलता है, नई चीज़ें याद नहीं रखता।”
उसके इस तर्क में दम था। मुझे थोड़ा ढाढ़स ज़रूर बंधा, मगर डर कम न हुआ। जिस क़ैदी को फांसी कि सज़ा हुई हो, उसे तो मौत का डर होगा ही, आप चाहें जितना मन उसे चिकन-पनीर खिला दें। भूषण मुझे नाना प्रकार के पनीर खिलता रहा, मगर डर तो घर कर बैठ चुका था मन में। बातों बातों में छुट्टी हो जाने की घंटी बजती है, सब लाइन बनाकर उठाई हुई किताबें यथास्थान रखते हुए लाइब्रेरी से निकलने लगते हैं। मैं भी अख़बार रख निकलने ही वाला होता हूँ कि मेरी नज़र सर की मेज़ पर रखी एक किताब पर जाकर पड़ती है। मैं उसे उठाकर देखता हूँ, वह थी “गोदान – मुंशी प्रेमचंद”। प्रेमचंद जी को पढ़े हुए तब कुछ 4 साल हो गए थे। सर का ध्यान मुझ पर गया, वह पूछते हैं,
“डू यू रीड दीज़?”
“येस सर, आई हैव रेड मेनी ऑफ़ हिज़ स्टोरीज़, बट नेवर अ नॉवेल। द बुक लुक्स न्यू।”
“येस, वी रिसेंटली अक्वायर्ड दिस एंड अ फ़्यू मोर। इफ़ यू वांट टु रीड दिस, आई कैन लेट यू इश्यू इट फ़ॉर अ वीक।”
“दैट वुड बी ग्रेट सर। थैंक यू।”
मैं किताब लेकर अपनी कक्षा में आ जाता हूँ, अब बस बैग लेकर घर के लिए रवाना होना था। मुझे अब तक जूठे बोतल से पानी पीना प्रेम लग रहा था। तब मुझे क्या पता था यह क़िताब मेरा परिचय करवाएगी, प्रेम से, सही मायनों में। मैंने कहा था न, जो जब घट रहा होता है, तब उसकी अहमियत हमें महसूस नहीं होती, बाद में होती है!
3.
श्रुति के माता-पिता से मैं अब तक नहीं मिला हूँ। देखा काफ़ी बार पहले भी है। उसकी मम्मी, कभी शाम को सैर करते हुए, कभी बाज़ार में खरीदारी करती हुई, तो कभी अपने घर के बाहर कपड़े डालते हुए दिख जातीं थीं। उसके पापा को भी कई बार ऑफिस से लौटते हुए देखा था, शाम को मैं कभी-कभी स्विमिंग करने के लिए जाया करता था, वहाँ वे प्रायः दिख जाते थे। मैं अपनी आत्मा को अब तक इतना दृढ़ नहीं पाता था की उनके सामने अपना परिचय दे सकूँ। अगर दे भी देता, तो वह फूहड़ता होती। अपने अभिभावकों की नज़रों में आ जाना, ऐसे मामलों में, किसी को भी पसंद नहीं होता। सब कोशिश करते हैं की बात छुपी रहे। आज भी, हमारा भारतीय समाज, पाश्चात्य समाज में लभ्य स्वतंत्रता के विपरीत, इश्क़ और मुहब्बत जैसे अल्फ़ाज़ों से मुंह मोड़ लेना ही उचित समझता है। हमारी परवरिश ही कुछ इस तरह की होती है कि बच्चा भले दुनिया भर कि, देश-जगत की बातें घर आकर अपने माता-पिता से बोले, पर वह यह कभी नहीं कहेगा, की उसे प्रेम है किसी से। सड़क पर माता-पिता के साथ चलते समय अगर उसकी प्रिया सामने से आती दिखे भी, तो वह उसे पहचानने से इंकार करने में ज़रा भी कतराएगा नहीं। ऐसा हमें सिखाया तो नहीं जाता, तो फिर यह स्वभाव हमारी अवचेतना में आ कैसे जाती है? जवाब है हमारा यह मति-मंद समाज, जिसने यह ज़रूर सिखाया की हमेशा प्रेम और एकता की बातें करनी चाहिए, पर साथ ही यह भी सीखा दिया की तुम अपने निजी प्रेम-प्रसंग की बातें घर की चहारदीवारी के अंदर नहीं कर सकते। ऐसा पाखण्ड समूचे राष्ट्र में प्रभुता हासिल कर चूका है, और आज भी कोने कोने में व्याप्त है।
“जुलाई 2011”
नवीं कक्षा में ख़राब नतीजों के चलते मेरी माँ को यह चिंता सताने लगी थी की मैं दसवीं में भी पिछले साल जैसे अंक लेकर आऊँगा। पापा को भरोसा था की सब ठीक हो जाएगा, मैं अच्छे अंक लाने लगूँगा, मगर मम्मी को तनिक भी यक़ीन नहीं आया पिताजी के प्रोत्साहनों पर। इसलिए ज़बरदस्ती मेरी ट्यूशन लगा दी गई, “जयकर क्लासिज़” के यहाँ। जिस दिन पापा के साथ वहाँ दाखिला करवाने गया, पता चला श्रुति भी वहीं पढ़ती है। श्रुति और मेरे बीच चीज़ें पेचीदगी(complications) भरी थी। मेरा तंग करना बंद नहीं हुआ था, पर उसका मुस्कुराना बंद हो गया था। मेरी हरकतों पर अब वह ध्यान नहीं देती थी, और मुझ जैसे किसी अंतर्मुखी(introvert) व्यक्ति के लिए जब एक द्वार बंद होता है, तो दूसरा खुलने में, विकल्प तलाशने में, बड़ा समय लगता है। मैंने अगले दिन से क्लासिज़ शुरू कर दीं। कुछ नए दोस्त बने, अन्य विद्यालयों के जो वहाँ पढ़ने आते थे। उनमें से एक था सेशगोपालन, बड़ा प्यारा लड़का था। मैं रोज़ उसके साथ ही बैठने लगा। रंगनाथन सर अच्छा पढ़ा रहे थे, वे गणित और भौतिक विज्ञान पढ़ाते थे हमें। उनके कारण मेरा क्लास में मन लगने लगा, कोई सवाल चल रहा होता, तो मैं, सेशगोपालन और एक दो और लड़के, हम सब मिलकर कोशिश करते की कौन सबसे पहले हल करता है सवाल। श्रुति के साथ भी अब ट्यूशंस के बहाने कुछ बात हो जाती थी। ऐसे ही हँसते खेलते कुछ दिन बीत गए।
मैं आपको बताना भूल गया, जिस दिन से मुझे यह मालुम हुआ की मेरे कोचिंग सेंटर में श्रुति भी जाती है, उसके अगले दिन से ही मैं श्रुति के घर से थोड़ी दूर पर खड़े एक पेड़ की ओट से उसे रोज़ घर से निकलते हुए देखता। शाम की क्लासिज़, ३ बजे से होतीं थीं। मैं कुछ पहले ही निकल जाता था घर से और उस खड़े पेड़ की ओट से, इंतज़ार करता था उसका। वहाँ से वह अपने घर से आते हुए, बिल्कुल साफ़ दिखाई पड़ती थी। मेरे लिए उन चंद मिनटों का वक़्त जैसे सब कुछ था। दिन के २४ घंटो में से यह एकमात्र ऐसा वक़्त था, जब मै उसे ठीक सामने से देख पाता था। बाकी वक़्त ज़ाया होता था लोगों से और दुनिया से नज़रें बचाने में। हमारा कैंपस ज़्यादा बड़ा नहीं था, इसलिए सारे मकान आस-पास ही थे। मुझे डर लगा रहता कि किसी परिचित ने अगर पकड़ लिया, तो बात फैलेगी, और दोनों के घर वालों को पता चल जाएगा। वह बेचारी ख़ामख़ा फँस जाएगी। ख़ामख़ा इसलिए, क्यूंकि मैं तब तक निश्चित नहीं था, इस बात को लेकर कि वह मेरे बारे में क्या सोचती है।
एक रोज़ मैं ठीक उसी तरह पेड़ के पीछे छिपा हुआ था, उसके कुछ निकट आ जाने पर मैं अपनी गुप्त जगह से साइकिल पर सवार पीछे से आता हूँ और चुपचाप उसके साथ-साथ चलने लगता हूँ। कुछ देर दोनों ने ही कुछ नहीं कहा, पर लड़कियाँ ज़्यादा देर तक चुप नहीं रह सकतीं, वह बोल ही पड़ती है,
“ऐ, तू पागल है? इस तरह धूप में क्यों खड़ा रहता है?”
“मुझे अच्छा लगता है धूप खाने में, और उस पेड़ पर ढेर सारी चीटियाँ हैं, सारे चाट जाता हूँ।”
“अच्छा? दोपहर को भी मैं ही मिली पागल बनाने को?”
“और तो कोई दिख नहीं रहा, वरना उसे भी बनाता।”
वह पैदल ही जाया करती थी कोचिंग सेंटर तक, मैं साइकिल से जाता था। उसे डेढ़-दो किलोमीटर चलने में क्या मज़ा आता था, मैंने कभी पूछा नहीं।
“तेरी कैरियर तो खाली है साइकिल की, किसी को बिठा लेता, वो देख वो लड़की जा रही है, बुलाऊँ? बिठाएगा उसे?”
“तू है तो उसे क्यों बिठाऊँ? तू ही बैठ जा, बेकार इतना चलेगी।”
“नहीं बाबा कोई देख लेगा, तू जा, मैं मज़ाक कर रही थी।”
मैं तत्क्षण मन ही मन बोल पड़ता हूँ, “काश मैं भी कर रहा होता मज़ाक.”
मैं अपनी पॉकेट से एक सेंटर फ्रेश निकालता हूँ और उसे अपने मुंह में भर लेता हूँ। वह मुझे ऐसा करते हुए देखकर एकदम से पूछ पड़ती है, “ये सेंटर फ़्रेश अकेले-अकेले ही खाएगा? मेरे लिए नहीं है?” इतना सुनते ही मेरा चित्त स्थिर हो जाता है, एहसास होता है की दूसरी सेंटर फ्रेश मेरे पास नहीं है। खुद को धिक्कारते हुए सोचता हूँ, “कितनी सही जगह पर कितने गलत वक्त में हूँ!”
शर्मिंदगी मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रही थी, उसने भी अब तक पढ़ लिया था चेहरा मेरा।
“कोई बात नहीं, फिर किसी दिन खिला देना, कल भी तो खड़ा रहेगा पेड़ के पास शायद?” वह इतना कहकर हँसने लगती है।
मैं निरुत्तर हो चेहरा बचाता हुआ साइकिल लेकर आगे निकल जाता हूँ। भीतर मेरे एक सन्नाटा पसर जाता है, और मैं जैसे किसी शून्य में विलीन होने लगता हूँ।
“क्या कुछ हो सकता था, अगर एक और सेंटर फ्रेश रहा होता, हम और कितनी दूर साथ साथ चल पाते, और क्या क्या बातें हो गई होतीं… ?”, मैं इसी को सोचता हुआ वहाँ से दूर निकल जाता हूँ।
श्रुति पीछे से मुझे पुकारती है, पर मैं अनसुना कर देता हूँ। अभी हिम्मत नहीं है मुझ में, बिलकुल भी नहीं।
पिछली माह FA-1 की लिखित परीक्षाएँ हुईं थीं। इस महीने की चार तारिख को PTA मीटिंग रखी गई, जहाँ हम छात्रों और उनके अभिभावकों को हमारी उत्तर-पुस्तिकाएँ दिखाई जानी थी। हमारे विद्यालय की प्रधानाचार्या सबको सम्बोधित करने वाली थीं। पिताजी को जब यह बात मैंने घर पर बताई, तो वह माँ के साथ विचार-विमर्श करने में जुट गए, की अगर कुछ पूछना हुआ अध्यापकों से, स्वयं प्राचार्या से, तो क्या पूछा जा सकता है। तब कुछ ऐसी हवा चली थी की नवीं में छात्रों ने जो अंक पाए थे, उनका विलय दसवीं के अंकों के साथ कर दिया जाएगा। मेरी नवीं में प्राप्त अंको को लेकर माँ वैसे भी नाराज़ थीं, इस नई ख़बर ने उन्हें चिंतित और बना दिया। मीटिंग से पहले की रात को उन्होंने पिताजी से ज़ोर दे कर कहा,
“वहाँ यह ज़रूर पूछिएगा की अंकों के विलय वाली ख़बर में कितनी वैधता है।”
“हाँ, यह पूछ लूंगा। और भी कुछ पूछ पूछना है?”
“नहीं, बस इतना ही।”
“यह नहीं पूछना, की तुम्हारा बेटा पढ़ता है या लापरवाही और ढिलाई बरतता है?”
“जाइये, मेरा बेटा लाखों में एक है। ऐसा सुपुत्र सिर्फ़ तपस्या करने पर ही मिलता है।”
पिताजी मज़ाक कर रहे थे, मगर उनकी चुटकियाँ सुनकर माँ से रहा न गया। माँ अपने बेटे को वैसे हज़ार फटकार लगा ले, लाखों बार डांट-डपट दे, पर बाप के सामने वह उसकी बुराई कतई नहीं सुन सकती। वह आपकी तुलना चाँद-तारों-सूर्य, और ऐसी ही तमाम उपमाओं के साथ करने लग जाती हैं। ऐसे अवसरों पर अपने संतान के लिए माँ के मुख से ऐसी-ऐसी प्रशंसाएँ, ऐसे-ऐसे बखान सुनने को मिलते हैं, की कोई बेटा / बेटी अगर वह एक बार सुन ले, तो अपनी माँ पर नाराज़ होना छोड़ दे। न हम सुन पातें हैं, न हम नाराज़ होना छोड़ते हैं। जो दो-एकबार सुन भी लेते हैं, तो लगता है बातें बना रहीं हैं। माँओं का ह्रदय बड़ा ही नर्म होता है, उन्हें सुना जाना चाहिए, और समझा जाना चाहिए। यह बात सही है और जितनी सही है, उतनी ही सटीक भी है की यह समाज ही उनके विकास में बाधा बन खड़ा हुआ है। पर समाज अगर हमसे ही बनता है, तो बदलेगा भी हम ही से न?
“4 जुलाई, 2011”
सुबह दफ़्तर के लिए निकलते वक़्त पापा ने माँ से कहा था 2:40 पर तैयार हो कर रहने को, ताकि वे ऑफ़िस से आकर माँ के साथ सीधे स्कूल पहुँच सकें। विद्यालय में भी, आज मैंने एक बेहतरीन काम कर दिखाया। आज विज्ञान का प्रैक्टिकल क्लास था, श्रुति ने लैब कॉपी निकाली और लैब जाने के लिए क्लास से निकल गई। वह अपने बैग का चेन बंद करना भूल गई थी। मैं चूँकि अच्छा बच्चा था, इसलिए बिलकुल किसी अच्छे बच्चे की ही भाँती, मैं चेन बंद करने उसके बेंच के पास जाता हूँ। चेन लगाते वक़्त मुझे उसकी स्कूल-डायरी दिखती है। आप सब जानते ही हैं, स्कूल-डायरी किसी भानुमति के पिटारे से कम नहीं होती। मैंने तुरंत उसे निकला और “पर्सनल डिटेल्स” के सेक्शन पर गया। उस पृष्ठ को देखते ही मेरी आँखें चमक उठीं, जैसे कोई खज़ाना हाथ लग गया हो। वहाँ उसका जन्मदिवस, माता-पिता का नाम, और संपर्क करने हेतु दो नंबर लिखे हुए थे। मैंने उसकी जन्मतिथि, और उन लिखे हुए दो नंबरों में से सिर्फ़ एक को याद किया। ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों संख्याएँ एक जैसी ही थीं, केवल शेष का एक अंक भिन्न था। एक ख़त्म होता था ‘960’ से, तो दूसरा ‘961’ पर। मैंने उसे अपनी लैब कॉपी में लिख लिया, और श्रुति का बैग ठीक से बंद कर अच्छा बच्चा भी बन लिया।
स्कूल ख़त्म होने की घंटी बज चुकी है, हम सब दसवीं के छात्र मूर्खों की तरह पहली मंज़िल से बाकी के बच्चों को विद्यालय छोड़ जाते हुए देख रहे हैं। कुछ देर बाद पियन भैया हमें ताकीद करते हैं कि हम CCE हॉल में बैठ जाएँ। धीरे-धीरे अभिभावकगण आने लगते हैं, उन्हें कलाश्री जी स्थान ग्रहण करने को कहतीं हैं(कलाश्री जी अँग्रेज़ी की फ़ैकल्टी हैं)। सबके आ जाने के कुछ देर बाद ही प्राचार्या आतीं हैं, और एकाएक ऐसी शान्ति छाती है हॉल में, कि जैसे सबको एक साथ, एक ही वक़्त पर सांप सूंघ गया हो। हमारी प्राचार्या का रौब ही कुछ ऐसा था। सभा शुरू होती है, प्राचार्या बहुत सारी चीज़ें कहती हैं, कि कैसे दसवीं की बोर्ड परीक्षाएँ महत्वपूर्ण हैं, कि कैसे आने वाले महीनों में, पढ़ाई और ज़ोरो से शुरू हो जाएगी, वगैरह वगैरह। उनके भाषण के समाप्त हो जाने के बाद, अभिभावकों से सवालों के लिए पूछा जाता है, कई हाथ खड़े करते हैं, मैं अपने पिताजी को ढूंढ रहा था, उन्होंने भी अपना हाथ खड़ा कर रखा था। प्राचार्या ने एक से कहा सवाल पूछने के लिए, उनका सवाल वही था, जो मेरे पिताजी पूछने वाले थे।
“गुड आफ़्टरनून मैम, माय क्वेश्चन इज़, विल द सिक्योर्ड मार्क्स ऑफ़ अ चाइल्ड इन हिज़ नाइन्थ ग्रेड, बी एडेड टु हिज़ सिक्योर्ड मार्क्स इन टेंथ?”
सवाल आम था, सभी आशापूर्वक प्राचार्या की ओर देखने लगे।
“वी आर येट टु रिसीव ऐन अपडेट ऑन दिस, इट विल बी कम्युनिकेटेड वन्स वी हैव सम इन्फॉर्मेशन।”
लोग संतुष्ट तो नज़र नहीं आये इस उत्तर से, पर ऐसे उत्तर के बाद पलटकर और पूछा भी क्या जा सकता था। कुछ और प्रश्नों के जवाब ढूंढें जाने के पश्चात हमें अपनी अभिभावकों के साथ, अपनी कक्षाओं में जाने को कहा गया। उत्तर-पुस्तिकाओं की मुँह दिखाई थी। मैं निश्चिंत था, क्योंकि मेरे सारे पेपर अच्छे गए थे। डर था सिर्फ़ दो बातों का, एक यह, की कहीं कोई अध्यापक यह न कह दे, की मैं बदमाशी करता हूँ, टीचर्स का ऐसे मौकों पर कोई भरोसा नहीं, उनके लिए PTA मीटिंग बिलकुल सोशल स्टडीज़ के पेपर लिखने जैसा है। अपने मन से कहानियां जोड़ते जाओ, बच्चे ने जो नहीं भी किया, वह भी बताओ, आप अपने माता-पिता के सामने उनकी बातों का खंडन भी नहीं कर सकते। दूसरी यह, की श्रुति के माता-पिता से अगर मिलना हुआ, तो कैसे मिलूँगा?
अब तक सारे पेपर देख लिए थे, सबसे मिल लिया था। अब बस विज्ञान का देखना बाकी था। मम्मी-पापा के साथ जयश्री जी के पास जाते ही उन्हें गुड आफ़्टरनून कहता हूँ, इम्प्रैशन जमाने के लिए। इन्हीं का डर था, मुझे देखकर कहतीं हैं,
“आरुष, यू हैव डन वेल इन दी एग्जाम”, और इतना कहकर मेरे पापा की तरफ़ देखकर बोलती हैं,
“ही इज़ नेवर टु बी फाउंड, सिटींग इन हिज़ प्लेस। नेवर, ही रोम्स अराउंड इन द क्लास व्हाइल आई ऍम टीचिंग। आई डोंट नो इफ ही डज़ दिस इन एव्री क्लास और जस्ट इन माइन।”
पापा मेरी तरफ़ देखकर कहते हैं, “वैरी बैड आरुष, व्हाई वुड यू रोम अराउंड, इज़ंट दैट डिसरेस्पेक्टिंग योर टीचर?”
उन्हें पता था कोई ख़ास बात नहीं है, पर शायद यह क्लास में घूमने वाली बात ठीक नहीं लगी उन्हें। मैं बोल पड़ता हूँ,
“सॉरी मैम!”
“इट्स फाइन आरुष, आई होप यू वुडन्ट डु दैट एवर अगेन.”
“आई प्रॉमिस मैम।”
जयश्री मैम शायद इतने में खुश हो गई थीं। उनसे विदा लेकर हम निकलने लगते हैं, की भूषण के माता पिता सामने आ पड़ते हैं, जान पहचान थी ही दोनों परिवारों में, इसलिए कुछ देर तक बड़ों में कुछ बातें होतीं हैं। तभी मुझे श्रुति की मम्मी कक्षा के अंदर उसके साथ आती हुई दिखतीं हैं, पीछे-पीछे उसके पिताजी भी चले आ रहे हैं। श्रुति मुझे देखकर मुस्कुराती है, मैं भी धीमे से मुस्कुरा देता हूँ। मेरे मम्मी-पापा जब जाने को हुए, तो मैंने उनसे कहा, “आप लोग जाइये, मैं कुछ देर में आता हूँ।”
जल्दी आ जाने की बात कहकर, वे दोनों चले गए.
मैं भूषण के सबसे मिल लेने और पुस्तिकाएँ देख लेने का इंतज़ार करने लगा। कुछ देर बाद वह मेरे पास आता है, और कहता है,
“ससुर जी और सासु माँ, दोनों आये हैं भाई।”
“हाँ, देखा, सोच रहा हूँ मिल लूँ। श्रुति परिचय करवाए तो ठीक है, मैं खुद से तो नहीं करने वाला।”
“ओके, आ जाने दे उसे फिर।”
मैं कक्षा के दरवाज़े पर खड़े होकर उनके सामने पेश आने के तरीके सोचने लगता हूँ।
‘क्या श्रुति ने कभी मेरा ज़िक्र किया होगा उनके सामने? क्या वे जानते होंगे मुझे?’, इन्हीं ख्यालों में मैं डूबा हुआ था की भूषण मुझे कुहनी मारकर इशारा करता है, श्रुति अपने माता-पिता के साथ आ रही थी। भूषण के परिवार से उनके अच्छे रिश्ते थे, इसलिए श्रुति की मम्मी भूषण को देखकर कहतीं हैं,
“कैसे हो बेटा?”
“नमस्ते आंटी, बस ठीक हूँ।”
मैं साथ ही खड़ा था, इसलिए मैंने भी अभिवादन करना ठीक समझा,
“नमस्ते आंटी!”
मुझे देखकर उनके चेहरे पर किसी को पहचानने में हो रही असुविधा के भाव परिलक्षित हो उठते हैं। तभी भूषण बोल पड़ता है,
“आंटी यह आरुष है, आपको याद है पोइला बोइशाख की पार्टी में गाना गाया था, यही तो है वो।”
“ओह, अच्छा! तुम ही हो आरुष, श्रुति ने बताया था तुम्हारे बारे में। मम्मी-पापा कहाँ हैं?”
यहाँ मेरे प्राण सूख गए।
“वे तो चले गए हैं आंटी, कुछ ही देर पहले गए।”
“अच्छा, उनसे मिलना बाकी रह गया, कोई बात नहीं। फिर कभी।”
“जी आंटी।”
अब तक मेरी सांसें फूलने लगीं थीं। मैं श्रुति की तरफ़ देखता हूँ एक बार, वह चुप-चुप सी खड़ी है, अपने पापा के साथ। मैं उसके पापा की तरफ़ भी देख लेता हूँ एक बार। वे मुझे ही देख रहे हैं।
“नमस्ते अंकल।”, मैं बोल पड़ता हूँ.
“नमस्ते।”, सिर्फ़ इतना ही कहा उन्होंने।
मुझे सब कुछ उल्टा-पुल्टा होता हुआ दिख रहा था, लग रहा था जैसे विधान के विपरीत मैं इस वक़्त किसी गलत जगह पर हूँ, मुझे जैसे यहां होना हो नहीं चाहिए। मैं भूषण से कहता हूँ चलने को। वह अपने मम्मी पापा से घर की चाबी लेकर मेरे साथ साथ चलने लगता है।
“क्या हुआ भाई, श्रुति के मम्मी-पापा कैसे लगे?”
“उसके मम्मी-पापा कुछ कड़े से नहीं लगे?”
“अरे नहीं भाई! बड़े मज़ाकिया हैं उसके पापा, और आंटी तो और भी ज्यादा। क्या बोलतीं हैं, मज़ा आ जाता है उनकी बातें सुनकर।”
“अच्छा? शायद मैं ज़्यादा ही सोच रहा हूँ फिर।”
“वो तो तू हमेशा ही सोचता रहता है, मत सोच इतना. फर्स्ट टाइम में ऐसा लगता है।”
“हम्म।”
हम दोनों साइकिल पर सवार हो अपने अपने घर की तरफ़ चल देते हैं।
4.
प्रेमचंद जी की वह किताब बैग में अब भी पड़ी हुई है। घर पर खोल नहीं सकता, क्योंकि माँ का डर है। देख लिया तो बड़ी डाँट पडेगी। उन्हें मेरा कुछ भी लिखना, बिलकुल नहीं पसंद। कभी किसी कॉपी या किताब में कुछ अपना लिखा हुआ मिल जाता उन्हें, तो फाड़ देतीं। नौबत तो यहाँ तक आ गई थी, कि मैं जिस डायरी में कविताएँ और कहानियाँ लिखता था, उसे घर के मुख्य द्वार के छज्जे पर रखना पड़ा। ऐसे माहौल में अगर वह मुझे उपन्यास पढ़ते हुए देख लेतीं, तो सारा घर सर पे उठा लेतीं। मैं स्कूल में हमारे लाइब्रेरियन, रेड्डी सर से कहकर हफ़्ते-हफ़्ते भर के लिए इसी किताब को बार-बार इश्यू करवाता रहा। अंततः एक दिन, स्थिर किया कि छुप-छुपाकर तो पढ़ा जा ही सकता है। मैंने तय किया रात में सबके सो जाने के बाद आराम से टेबल पर बैठकर पढूँगा। उस रात सबके सो जाने के बाद, मैंने बैग से ‘गोदान’ निकाली, और उसे पढ़ने बैठ गया। होरी और धनिया के संघर्ष की बात पता चली, गोबर की अकर्मण्यता उजागर हुई, उसके विवाह के पश्चात समझ आया कि कैसे विवाह इंसान को समझदार और संजीदा बना देता है। उसे कर्तव्यबोध हो जाता है, एक स्वामी होने का, एक बाप होने का, बेटा होने का। मैं पढ़ता गया, पढ़ता गया, जैसे आँखों के सामने जीवन के कितने ही राज़ खुलते चले जा रहे थे, जैसे कितने ही अगण्य प्रश्नों के उत्तर, जिन्हें मैं इतने दिनों से तलाश रहा था, किसी ने इस किताब में उपन्यास के रूप में लिखकर दे दिए थे। मैं जैसे किसी और कि लिखी किताब में अपने जीवन का साक्षात् दर्शन कर रहा था। हर अध्याय के आख़िर में कोई ऐसी बात छिपी होती, जो मुझे इस बात का ख़याल तक आने नहीं देती कि अब किताब बंद कर सो जाना चाहिए। उसे पढ़ना बिलकुल अलौकिक था मेरे लिए, रोज़ थोड़ा थोड़ा कर पढ़ता रहा, नए किरदार जुड़ते गए, ‘मिर्ज़ा साहब‘, ‘राय साहब‘, आदि। उनके बारे में पता चला, कुछ किरदार छूटे भी। इसी तरह डॉक्टर मेहता उपन्यास के मध्य में आते हैं, औरतें उनके रूप और वाकपटुता की कायल हैं। वे मिस मालती से मिलते हैं, दोनों परम मित्र बन जाते हैं। फिर किस तरह से समय अपना खेल दिखाता है और दोनों में प्रेमोदय होता है। मेहता साहब मालती पर जान छिड़कते हैं, उन्हें देवी मान बैठते हैं, निरे उपासक कि तरह। मालती, डॉ. मेहता में अपना आदर्श देखतीं हैं, दोनों साथ-साथ जीवन का मर्म समझने लगते हैं, और अंत में मालती और मेहता यह स्थिर करते हैं, कि स्त्री-पुरुष से कहीं अधिक बेहतर है मित्र बने रहना, एक ऐसे जीवन का निर्वाह करना, जहाँ दायित्वों के बोझ तले सारा जीवन खप न जाए, परस्पर के लिए समय ही ना बचे। काफ़ी प्रभावित किया मुझे इस प्रेम युगल के अनोखे से प्रेम ने। मुझे इस उपन्यास के बाकी के पात्र भी अच्छे लगे, होरी का आख़िरकार मर जाना, उसकी एक गाय रखने कि आकांक्षा का पूर्ण न होना, रूढ़िवाद, सामंतवाद, शोषण, आदि विषय बेहद रुचिकर थे। देश और जीवन का इससे सुंदर एवं सजीव चित्रण शायद ही किसी उपन्यास में किया गया हो। परंतु, मुझे मेहता और मालती की कहानी ने अंदर तक छू लिया था, हो सकता है दसवीं कक्षा में पढ़ रहे बालक के लिए, शोषण, ऊंच-नीच, सामंतवाद, और ऐसे ही अन्य विषयों में दिलचस्पी बढ़ा पाना मुश्किल था। एक और कारण हो सकता है कि क्यों मुझपर मेहता-मालती कि कहानी ने ऐसा असर डाला। स्वयं मेरे जीवन में भी तो यह ही चल रहा था। मैं श्रुति को देवी मान बैठा था। मेरा ध्यान श्रुति के अधरों पर कभी नहीं गया, न मैंने उन्हें चूमने के स्वप्न बाँधे। उसके बदन के विकास से फूल जलते हों, मेरी दृष्टि और रूचि उनमें नहीं रही। मेरे लिए श्रुति का दर्शनमात्र ही बहुत था। उसके ह्रदय कि निश्चलता, उसकी बातों का इंद्रजाल, उसके नयनों की चंचलता, उसका वाक्चातुर्य, इन्हीं ने मुझे झकझोरा। मेरी समस्या गोदान पढ़ने से पहले तक यह थी, की जो मैं श्रुति को लेकर महसूस कर रहा था, बिना यह जाने की प्रेम क्या चीज़ है, उसे प्रेम कैसे कहता? गोदान पढ़ने के उपरांत मुझे अपनी उलझन से मुक्ति मिली।
दोपहर का सिलसिला अब भी बरकरार था, उसका घर से निकलना, मेरा साइकिल से उसके साथ-साथ कुछ देर तक चलना, फिर आगे निकल जाना। अब तो वापस आते वक़्त भी किसी किसी दिन उसके साथ साथ आने लगा था। मैं उसकी आँखों, उसकी बातों को चलते चलते मन ही मन नमन किया करता। ‘जयकर क्लॉसेस‘ में मैं अब बायोलॉजी की क्लास भी करने लगा था, क्लॉसेस हर रविवार सुबह 7:00 बजे से 9:00 बजे तक होतीं थीं। जी हाँ, श्रुति भी आती थी बायो की क्लास के लिए। जीवन में इस समय, कोई कष्ट नहीं था, कोई परेशानी नहीं थी। बस एक दुनिया थी, जिसमें सिर्फ़ मैं था, अभी, उसका आना बाकी था।
सितम्बर 11, 2011 (रविवार)
याद है, वह डायरी जो निकाली थी श्रुति के बैग से? उसमें उसकी जन्मतिथि और दो फ़ोन नंबर मेरी कॉपी में अब तक लिखे हुए थे। पर कभी हिम्मत नहीं हुई की उसे कोई मैसेज भेज सकूँ। क्या पता कौन देख ले, उसके मम्मी-पापा के साथ हुई पहली मुलाक़ात के नतीजे कुछ संतोषजनक नहीं रहे थे, अतः फलस्वरूप, डर और ज़्यादा लगने लगा। आज श्रुति का जन्मदिन है! विगत रात जैसे-तैसे एक स्वनिर्मित ग्रीटिंग कार्ड बनाई थी, कारण सुबह उठकर बनाने का समय नहीं मिलता। पौने ७ बजते-बजते मैं क्लास करने निकल गया, वहाँ मेरे पहुँचने के कुछ देर बाद श्रुति आती है। आज उसने नए कपड़े पहने हुए हैं, खुले बाल, चेहरे पर एक कोमल मुस्कान लेकर, वह कक्षा में प्रवेश करती है। मैं खुद से बोल पड़ता हूँ, “वाह! तुम प्रकृति को तुच्छ प्रमाणित कर दो मृगनयनी!”
क्लास ख़त्म होने के बाद, श्रुति सभी को चॉकलेट्स बाँटती है, और हम सब सहपाठी जन्मदिन गीत गाते हैं। मैं इस कार्यक्रम के ख़त्म होने के तुरंत बाद ही अपनी साइकिल लेकर कैंपस की तरफ़ भागता हूँ। मेन गेट से अंदर पहुंचकर अपनी बायो की किताब खोलता हूँ, और इसके बाद वह ग्रीटिंग कार्ड और साथ में गोंद की एक छोटी सी बोतल हाथ में रख लेता हूँ। आज जैसे शरीर में किसी ने ईश्वरीय ऊर्जा का संचार कर दिया है, जैसे पर लग आएँ हैं। किसी बात का डर नहीं, संभावित परिस्थितयों का भय नहीं। मैं, साइकिल घुमाता हूँ उस बिल्डिंग की तरफ़, जिसके निचली मंज़िल पर श्रुति का मकान था। मैं साइकिल सड़क पर खड़ी करता हूँ, चलते-चलते कार्ड के पीछे गोंद लगता हूँ, और उसे श्रुति के घर के दरवाज़े पर चिपका देता हूँ!
वहाँ एक डर था, कोई मुझे ऐसा करते हुए बस देख न ले। उद्दिष्ट काम ख़त्म होने के तुरंत बाद, मैं बग़ैर समय बर्बाद किये चुपचाप चोर की तरह वहाँ से निकल जाता हूँ। कुछ दूर जाकर मुझे एहसास हुआ कि यह मैंने क्या कर दिखाया! पैरों में खून दौड़ रहा था, शरीर में अजीब सी स्फूर्ति थी। मैंने उसे दरवाज़े पर इस उम्मीद से चिपकाया था, की जब श्रुति क्लास करके वापस घर लौटे, तो उसे ही सबसे पहले कार्ड दिखे। घर पहुँचकर मैंने पिताजी का फ़ोन उठाया। आज चूँकि मौका भी था, और दस्तूर भी, मैंने उन दो नंबरों में से एक पर टेक्स्ट किया,
“जन्मदिन कि ढेरों शुभकामनाएँ!”
इतना लिखकर मैं नाश्ता करने चला गया। 10 बजे के करीब करीब, फ़ोन पर एक सन्देश आता है,
“थैंक यू सो मच रे, यह मेरा नंबर नहीं है, मम्मी का है। – श्रुति”
मेरी ख़ुशी का कोई ठौर-ठिकाना न रहा। वह समझ गई थी कि सन्देश मैंने ही भेजा था। तुरंत लिखा,
“यू आर मोस्ट वेलकम! कार्ड मिला?”
“मैं यही कहने वाली थी, तू पागल है क्या? मेरे हाथों में दे देता, दरवाज़े पर कौन चिपकाता है?”
“मैं हाथों में तो कभी न दे पाता, कभी किसी को नहीं दिया। ग्रीटिंग कार्ड पहले भी काफ़ी बनाए हैं, पर कभी किसी लड़की को देने का संयोग नहीं हुआ।”
“ओहो! तो मैं ही वो पहली लड़की हूँ क्या, जिसे आप से ‘ग्रीटिंग कार्ड‘ मिल रहा है?”
“हाँ!”
“अच्छा छोड़ ये सब, तुझे पता है, कार्ड मैंने नहीं, मम्मी ने उठाई पहले। वो दूध लाने गई हुईं थीं, आकर देखा दरवाज़े पर कार्ड चिपका हुआ है। तूने अच्छा किया नाम नहीं लिखा था, मैंने बोल दिया किसी दोस्त ने लगा दिया होगा।”
हा हन्त! मेरा आंटी को ग्रीटिंग कार्ड दिखाने का उद्देश्य तो न था। यह क्या सोच कर लगाया था और क्या हो गया?
“तो तूने कार्ड खोलकर देखा?”
“हाँ रे, पूरा देखा, ‘रॉसेज़ आर रेड, वायलेट्स आर ब्लू, हेलो श्रुति घोष, हैप्पी बर्थडे टु यू‘, कुछ अपने मन से भी लिख देता।”
“अब से लिखूँगा, तू पढ़ना बस।”
“हाँ हाँ, क्यों नहीं पढूँगी, ज़रूर पढूँगी…”
“टाटा”
“सी या! बाय…”
कार्ड चिपकाने के पीछे का मकसद विफल हुआ ज़रूर था, पर श्रुति को फ़ोन पर टेक्स्ट करने के बाद, एक नया दरवाज़ा खुल चुका था। प्रेम मेरे जीवन में, उदय पर था…
5.
नंबर सेव हो गए थे दोनों घर के फ़ोनों में। मुझे ‘गोयल’ नाम उत्तम लगा, तो श्रुति को ‘पूजा’। मैंने ‘गोयल’ क्यों रखा, इसका उत्तर मेरे पास नहीं है। पहले दिन थोड़ी बातें हुईं, ‘कुछ होमवर्क दिया था क्या?’, ‘तूने गणित के दिए प्रश्न हल कर लिए? आखिर में कितना आया?’, आदि। धीरे-धीरे बातें लंबी होने लगीं. इधर-उधर की बातें, क्लास की कौनसी लड़कियाँ उसे पसंद नहीं थीं, क्यों उसे पांडेय की बातों पर हंसी आती थी(पांडेय से जलता था मैं, स्कूल में श्रुति के इर्द-गिर्द काफ़ी घूमा करता था वह)।
हम नियमित रूप से नित-प्रतिदिन बात करने लगे, रात में ग्यारह बजे से लेकर मध्यरात्रि के बारह बजे तक, कभी-कभी वार्ता लंबी चलती तो बारह बजकर कुछ और मिनट भी हो जाया करते। मूलतः बात यह थी की हमें परस्पर एक दूसरे में मित्र दिखाई देने लगे थे, उसे इस अनजान शहर में एक ऐसा शख्स मिल गया था, जिससे वह अपने मन की बातें कर सकती थी। मैं तुनुकमिजाजी रहा हूँ, हमेशा से ही। दिनभर दुनिया से लड़ झगड़ कर घर आने के उपरांत रात को श्रुति के संग फ़ोन पर बिताये उन लम्हों में इतनी शालीनता होती थी, कि लगता था जैसे मेरे इस अधीर चित्त को नीरवता के आँचल का छाँह मिल गया हो। उसकी बातें शीतल हवा के थपेड़ों से थे, जिन्हें महसूस कर आत्मा सौम्यता के शिखर पर पहुँच जाता था!
एक रात बारह बज चुके थे, मुझे नींद आने लगी थी सो मैंने कहा,
“मेरी आँखें बंद हो रहीं हैं, मैं सोने जा रहा हूँ, गुड नाईट।”
तिसपर वह कहती हैं, “बारह बज गए हैं पागल, गुड मॉर्निंग बोल!”
“गुड मॉर्निंग बोलकर सोने जाऊँ? थोड़ा अजीब नहीं है?”
“अजीब तो है, पर जो अजीब है, ज़रूरी तो नहीं की गलत भी हो। है न?”
मैं उसकी इस बात पर थोड़ा सोच में पड़ गया, कितनी सुन्दर बात कही थी, ‘जो अजीब है, ज़रूरी तो नहीं की गलत भी हो!’
श्रुति के परिपक्वता पर विस्मित और मुग्ध हो बैठा ही था, की फ़ोन वाइब्रेट होता है,
“हेलो? सो गया क्या?”
“नहीं नहीं, यहीं हूँ, तू सही कह रही है…”
“क्या सही कह रही हूँ?”
“यही की हर अजीब चीज़ गलत नहीं होती।”
“तू अब तक यह सोच रहा था?”
“हाँ!”
“बहुत सोचता है तू, इतना नहीं सोचना चाहिए। मेरी इतनी सी बात से तू सोच में पड़ गया, इसलिए न गुड नाईट, न गुड मॉर्निंग कहने की ज़रुरत है। नींद आ गई है तुझे, सो जा।”
“जो हुकुम मेरे आका।”
“हुकुम नहीं देती तो नहीं सोता?“
“माफ़ कर दो, हर एक बात पकड़कर टोकने लगती हो!”
“ठीक है चल, अब कभी कुछ न बोलूंगी।”
“इतनी निर्दयी हो जाएगी, फिर मेरा क्या होगा?”
“अच्छा, मेरा टोकना तुझे पसंद नहीं, बात न करना भी पसंद नहीं, चाहता क्या है आरुष?”
“तुम्हारा साथ!”
“वह तो है ही…”
“क्या हमेशा रहेगा?”
“यह तो महादेव के अतिरिक्त और कोई नहीं बता सकता। अब तू व्यर्थ की बातें छोड़ सोने जा। कल स्कूल में मिलते हैं।”
“हाँ…”
मेरे हाथ इस ‘हाँ‘ के अतिरिक्त और कुछ न लिख पाए थे… श्रुति के जाने के साथ ही, मेरी निद्रा भी न जाने कहाँ ओझल हो गई थी।
1 अक्टूबर, 2011
आज स्कूल का आखरी दिन है, इसके बाद दुर्गा पूजा के चलते १० दिन की छुट्टियां हैं। कैंपस के सारे बंगाली मिलकर दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं। बंगाली दुर्गा पूजा को नवरात्री की तरह 9 दिन तक नहीं मनाते हैं, वे मुख्यतः आखिर के पांच दिनों का ही पालन करते हैं, यानि की षष्ठी से लेकर दशमी तक। दशमी के दिन माँ दुर्गा, और उनके साथ कार्तिक, लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती की प्रतिमाओं का भी विसर्जन किया जाता है। कितने ही कार्यक्रम होते हैं, बच्चों और बड़ों द्वारा नृत्य प्रदर्शन, महालया का मंच पर सुन्दर प्रस्तुतीकरण, ऑर्केस्ट्रा, आदि। ऑर्केस्ट्रा नवमी की रात को रखी जाती थी, जिसमे पूरा कैंपस आमंत्रित होता था। षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी की रातों को कोई न कोई कार्यक्रम रहता ही था। हर रात ढाक के सम्मोहक तालों पर मन मुग्ध हो थिरक-थिरक जाता था। यूँ ही नाचते गाते, माँ के आगमन और विदाई के बीच ५ दिन देखते ही देखते बीत जाते।
मैंने श्रुति से स्कूल के बाद रुकने के लिए कहा था, कुछ बात करनी थी। छुट्टी के बाद स्कूल से निकलते वक़्त देखता हूँ की मेन गेट के सामने श्रुति खड़ी है, अपनी दोस्त पूजा के साथ। भूषण भी मेरे साथ ही था। मैं और श्रुति आगे-आगे चल रहे हैं, भूषण और पूजा पीछे-पीछे।
“कल आ रही है न?”
“हाँ, पर पूरी फॅमिली साथ ही आएगी।”
“क्या मिलना एकदम मुमकिन नहीं होगा?”
श्रुति ने मुझसे कह रखा था की पूजा मंडप के आसपास उसे जाननेवाले काफ़ी लोग होंगे, इसलिए यही हितकर होगा कि दोनों एक दूसरे को न देखें और ज़्यादा घुले-मिले न। मेरे इस तरह दुबारा पूछने पर उसने कहा,
“अच्छा चल, देखूंगी। अगर संभव हुआ, मिल लेंगे।”
“इसमें असंभव जैसा क्या है श्रुति? मिलना ही तो है।”
“मैं जानती हूँ आरुष, पर सारी परिस्थितियां मेरे अनुकूल भी तो नहीं है ना? मेरे हाथ में रहा होता, तो मिलने का वचन दे देती। पापा पूजा-सेक्रेटरी नियुक्त हुए हैं, मुझे माँ के साथ रहना होगा। पर मैं कह तो रही हूँ, अगर संभावना दिखे मिल पाने कि, ज़रूर मिलूँगी।”
“मैं समझता हूँ श्रुति, मुझे भरोसा है ईश्वर कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकालेंगे।”
“हाँ आरुष, मुझे भी उम्मीद है!”
कल्पनाओं से उभरे विचारों का न तो कोई सिरा होता है, न छोर! मैं मान चुका था कि हम कल मिल रहे हैं, मन में किसी संभावित रुकावट का डर नहीं था, लेश मात्र भी नहीं। कल श्रुति से मिलने के ख़्यालों में डूबा, मैं अपनी साइकिल पर सवार घर कि तरफ़ चल देता हूँ।
रात को मैंने 11:00 बजे उसे एक टेक्स्ट भेजा, “हम कल मिल रहे हैं।” और इतना ही कहकर सोने चला गया। सुबह उठकर फ़ोन चेक किया, उसका कोई रिप्लाई नहीं था। एक घबराहट सी हुई, “क्या होगा अगर नहीं मिल पाएँ? मिलना हो न हो, एक दूसरे को देख तो सकते ही हैं! और अगर मिलते हैं, तो पूजा परिसर से कहीं दूर जाना होगा, जहां हमे हवा भी न छू सके, चाँद की किरणें भी हमें न ढूंढ पाएँ। और किसके पास इतना बेकार का वक़्त पड़ा है, कि हमें पहचान लेने पर हमारे माता-पिता से जाकर शिकायत करे? मगर यह भी सत्य है कि इस दुनिया का, और उसमें रह रहे लोगों का कोई भरोसा नहीं, इस युग में इंसान किसी परजीवी की भांति औरों के दुःख से अपना सुख आँकता है। उसके खुद के आम के वृक्ष भले ही फलों से लदे पड़े हों, परंतु वह सोते-जागते यही कामना करता है, की पड़ोसी के अहाते में खड़े आम के पेड़ भी खूब फलें, पर उन फलों को काटने पर उनसे कीड़े ही निकलें, फल खाने लायक न रहे। औरों के घरों में आग लगाकर, उस आग में हाथ सेंकने का आनंद, इसी युग में रह रहे लोगों से मालूम किया जा सकता है। अतः, कोई हमें साथ देखकर हमारे अभिभावकों को खबर नहीं करेगा, इस संभावना को नकारना असंभव है।”
इसी तरह खुद से सच्चे-झूठे सवाल करते-करते शाम हो आती है। माँ मंडप में जाने के लिए तैयार हो रहीं हैं। स्टेज पर आज पहला ही प्रोग्राम महालया का है। इसमें मैं दो गाने प्रस्तुत करने वाला हूँ, और बाकी के गीतों का प्रस्तुतीकरण कुछ आंटियाँ मिलकर करेंगीं, माँ सभी गीतों के साथ तबले पर संगत करने वालीं हैं। कुछ लोग थोड़ी देर पहले आकर घर से तबला और हारमोनियम मंच तक पहुंचाकर आए हैं। थोड़ी देर के बाद हम मंडप के लिए घर से निकल पड़ते हैं, वहाँ पहुँचकर मैं सर्वप्रथम मंडप में जाकर प्रथानुसार माँ दुर्गा एवं उनके संतानों की प्रतिमाओं को नतमस्तक हो प्रणाम करता हूँ। आमतौर पर आँखें बंद कर भगवान के सामने मैंने उनसे कभी कुछ माँगा नहीं था, और स्वयं ईश्वर के प्रति मेरी आस्था भी कभी इतनी नहीं रही की उनसे कुछ मांगने की आवश्यकता आन पड़ी हो। किंतु मन आज लालची हुए बिना रह नहीं पाया, मैंने आँखें बंद कीं और भावपूर्ण हो उनसे मन-ही-मन कहा,
“हे माँ, मैं नहीं जानता आप क्या हैं, आप कौन हैं, पर सुना है आप ज़रूरतमंदों की पुकार सुन उनकी सहायता अवश्य करतीं हैं। इसलिए हे जगद्धात्री! हे कात्यायनी! आज कोई पथ दिखलाएँ की श्रुति और मेरा मिलन संभव हो सके। प्रेम का मुझे अधिक अनुभव तो नहीं, इस कारण मेरा मन मुझसे जो करने को कह रहा है, मैं वही कर रहा हूँ। इंसान जब कुछ गलत करने वाला होता है, उसके भीतर स्वतः एक आवाज़ कुछ देर के लिए आती है, जो उसे ऐसा करने से रोक रही होती है, मगर पाप करने का प्रलोभन उस क्षण कुछ इतना लुभावना लगता है की मनुंष्य अपने आप पर काबू नहीं रख पाता और इस अंतरात्मा के चेताने को नज़रअंदाज़ कर देता है। मेरे भीतर आज सच ऐसी कोई भी आवाज़ मुझे सुनाई नहीं दी। इसलिए मुझे विदित है कि आपका साथ मुझे अवश्य मिलेगा माँ।”
आँखें खोलते ही मह्सूस किया कि इतनी बातें कह लेने के पश्चात मन हल्का हो चूका था। प्रसाद लेकर मैं मंच के नेपथ्य में जाकर माँ से कहता हूँ, “प्रोग्राम शुरू होने से पहले आ जाऊँगा, आप यहीं रहना।”
“जल्दी आ जाना, मुझे किसी को भेजना न पड़े तुम्हे जाकर ढूंढ लाने के लिए।”
“अरे! आ जाऊँगा…”
अतीत में ऐसा एकबार हो चुका था, हम तब सपरिवार ग्वालियर में रहते थे। इसी प्रकार मेरा प्रोग्राम था और मैं स्टेज के आस पास कहीं भी नहीं था। तब पिताजी को माइक से अनाउंस करवाना पड़ा था, सच, बड़ा अजीब लगा था खुद का इस तरह से बुलाया जाना। तब ख़ैर बहुत छोटा था मैं, पांचवी श्रेणी में पढता था, बड़ी डाँट पड़ी थी माँ से, पिताजी से अलग। आज मन अस्थिर सा था, एक जगह दो मिनट खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। मेरी आँखें उतावली हो रहीं थीं, और मैं जानता था वे तभी तृषित हो सकतीं थीं जब उन्हें श्रुति का आना दिखता।
मुझे अचानक भूषण अपनी माँ के साथ आता हुआ दिखता है, मैं तुरंत आंटी को नमस्कार कहकर उसके साथ बात करने में मशगूल हो जाता हूँ।
“भाई, अभी तक नहीं आई?”
“नहीं यार, अब तो प्रोग्राम भी शुरू होने वाला है। उसे मैंने बताया भी नहीं था की आज प्रोग्राम है मेरा।”
“अरे यह तो बताना चाहिए था न, जल्दी आने का रीज़न होता उसके पास, आजकल कौन देखता है यह सब प्रोग्राम? मम्मी-पापा लोगों के लिए है, देखना सारे अंकल आंटी देख रहे होंगे, अपनी उम्र का कोई न मिलेगा।”
“अब तू नहीं देखता, मतलब कोई नहीं देखता? बैठकर देखा है पूरा महालया कभी?”
“मेरे देखने न देखने से क्या फ़र्क पड़ता है भाई? श्रुति को दिखाना था ना…”
“गड़बड़ हो गई यार, दूसरी बातों के चक्कर में यह याद ही नहीं रहा। अब तो उम्मीद ही कर सकते हैं की प्रोग्राम शुरू होने से पहले तक वह आ जाए।”
“अरे भाई, उसके पापा तो यहीं हैं, वो देख…”
पीछे मुड़ते ही देखता हूँ, श्रुति के पापा दर्शकों के बैठने की जगह का निरीक्षण कर रहे हैं। मैं तुरंत भूषण से पूछता हूँ,
मैं – जाकर पूछ सकता है वे कब आएंगे?
भूषण – देख, ऐसे पूछ लूंगा, ‘नमस्ते अंकल, कैसे हैं आप? आंटी और श्रुति नहीं आए?’ सही है ना?
मैं – हाँ ब्रो, फ़र्स्ट क्लास। जा, पूछ के आ।
भूषण उनसे पूछने के लिए जाता है और उसके जाने के साथ ही मैं उलटी तरफ़ देखने लगता हूँ। कुछ एक-दो मिनट बाद भूषण वापस आकर बताता है,
“भाई, अंकल ने तो कहा की वो लोग भी आ चुके हैं, पर अगर आ गए हैं तो हैं कहाँ?”
हम अपनी नज़रें इधर-उधर दौड़ाने लगते हैं, जहाँ कहीं भी लड़कियों का जमावड़ा दिखा, हमने उधर तलाश की। किसी-किसी को दूर से देखने पर उसके श्रुति होने का भ्रम हो जाता। ज़रा देर के लिए मेरी आँखें मंडप की तरफ़ घूमतीं हैं, वहाँ श्रुति अपनी माँ के साथ बैठी हुई, मुझे ही देख रही थी! मेरी आँखों और चेहरे पर मूर्छा-सी छा जाती है। मैं इसी खुमारी में डूबा हुआ खुद से एक अज्ञात सा प्रश्न कर बैठता हूँ, “मैंने सर्वप्रथम मंडप में क्यों नहीं ढूँढा? श्रुति ने कहा तो था की उसे अपनी माँ के साथ रहना पडेगा। न जाने बिचारी मुझे कब से देख रही है? लानत है मुझे मेरे इस विवेक पर…”
जब उसे भरोसा हो गया की मैंने उसे भीड़ में पहचान लिया था, उसने एक राहत की साँस ली। लगा जैसे कह रही हो, “बहुत पहचाना मुझे तुमने, केवल डींगे हाँकते रहे की प्रेम करते हो, और यहाँ तुम्हारी आँखें मुझे ढूंढ तक न पाईं?” मैं लज्जित हो खड़ा ही था, इतने में भूषण आकर मुझे खबर करता है की मेरी मम्मी मुझे बुला रहीं हैं। मेरे जीवन के अलग-अलग चरणों में, मेरी माँ का यूँ अकस्मात् प्रकट हो जाना, मेरे लिए आजीवन एक रहस्य ही रहा। वे भला इस समय क्यों बुला बैठीं? अभी तो शुरू ही हुआ था, आँखों से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला, दूर से ही कुछ न कहते हुए, रूठने-मनाने का स्वांग। परंतु मुझे निकलना ही पड़ा इस घटनाचक्र से, दुबारा स्टेज पर से खुद का बुलाया जाना मुझे स्वीकार्य नहीं था। मैं तुरंत माँ के पास जाकर प्रोग्राम के शुरू होने का इंतज़ार करता हूँ, मंडप और बाकी जगह लोगों के जितने जमघट थे, सभी आकर स्टेज के सामने रखी कुर्सियों पर धीरे-धीरे आकर बैठने लगते हैं। कुछ ही देर में प्रस्तुतकर्ता सारे प्रतिभागियों के नाम लेने लगते हैं, और हम सब एक-एक कर मंच पर जाकर स्थान ग्रहण करते हैं। महालया का प्रस्तुतीकरण शुरू हो चुका था, कुछ गीतों के बाद मेरे गाने की बारी आई। “नमो चंडी, नमो चंडी…”. तिताश, जिसे मेरे साथ इसी गीत पर अपने नृत्य द्वारा गीत के भावों का प्रकटन करना था, उसने सबको अपने नृत्यकौशल से सम्मोहित कर दिया। पूरे प्रदर्शन के दौरान सभी तिताश और उसकी अदायगी को निर्निमेष तकते रहे, जैसे कोई जादू कर दिया था उसके नर्तन ने सबके ऊपर। इसके कुछ समय उपरांत ही मेरा प्रोग्राम ख़त्म हो जाता है, और मैं तुरंत मंच से उतर कर भूषण के पास पहुँचता हूँ, जो मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था।
“मस्त था भाई, मज़ा आ गया!“
“तू सुन भी रहा था? जितना मुझे याद है, तूने कहा था सिर्फ़ बड़े-बूढ़े बैठे होंगे कार्यक्रम देखने… एक ही रात में उम्र बढ़ गई?”
“भाई, तेरा प्रोग्राम था, मालूम था अच्छा होगा, कैसे नहीं देखता?”
“बस–बस, इतनी भावुकता ठीक नहीं। श्रुति से मिला था?”
“नहीं, मिला तो नहीं, उसके बहन से मिला था पर, अभी–अभी आई। मैंने पूछा लेट आने का रीज़न तो कहती है पढ़ रही थी, दुर्गा पूजा में कौन पढ़ता है भाई?”
“वही, पूजा के दिनों में कौन पढ़ता है? वैसे पढ़ने का समय तो नहीं होता कोई, फिर भी, पूजा के दौरान… यह थोड़ा ज़्यादा ही हो गया।”
“वही न यार… ऊपर से अभी सिक्स्थ में है। भरोसा करना मुश्किल हो रहा है की बच्चे अभी से इतना पढ़ने लगे हैं।”
“यह लोग हमसे भी आगे निकलेंगे देखना.”
“भाई नहीं निकलेंगे, तो दुनिया आगे कैसे बढ़ेगी? इंसान का… वो क्या बोलते हैं… डेवलपमेंट को हिंदी में क्या बोलते हैं?”
“विकास…?”
“हाँ, विकास, विकास कैसे होगा अगर हमसे बाद वाली जेनरेशन हमसे ज़्यादा मेहनत न करे तो?”
“बात तो सही है तेरी”, इतना कहकर मैं श्रुति को दर्शकों में खोजने लगता हूँ, बहुत ढूँढा, पर न उसकी मम्मी दिखीं, न वह खुद। भूषण मेरा अकुलाया हुआ चेहरा देख मेरी बेचैनी भाँप गया था,
“ये सब छोड़, श्रुति से मिलना है की नहीं?”
“तब से मैं वही सोच रहा हूँ, पर वह शायद अपनी मम्मी के पास ही बैठी हुई है, इधर-उधर घूम रही होती तो जाकर पूछ लेता। बड़ी मातृभक्त है यार, मतलब होना ही चाहिए, पर इतना ज़्यादा?”
“अब मैं क्या कहूँ? देख, कुछ न कुछ तो जुगाड़ लगाना ही पड़ेगा… अच्छा… मैं एक काम करता हूँ, उसकी बहन से जाकर कहता हूँ की श्रुति को मंडप में भेज दे और खुद अपनी मम्मी के साथ बैठ जाए। वो जब मंडप के पास आये, तू जाकर मिल लेना। उसकी मम्मी को अकेले रहना भी नहीं पड़ेगा, और तेरा भी काम हो जाएगा, क्या कहता है?
“ऐसा करना ठीक रहेगा?”
“ये तो मैं भी नहीं बता सकता, पर इस वक़्त, इससे बढ़िया आईडिया मेरे दिमाग में तो नहीं आ रहा भाई…”
“तो फिर ठीक है, यही कर, मैं मंडप के पास रुकता हूँ।”
“रॉजर दैट”
“जंग लड़ने जा रहा है?”
“हाँ, तेरे हिस्से का”, भूषण मुस्कुराता हुआ वहाँ से चला जाता है.
मैं उसी की ओर देखता रहता हूँ, वहाँ खड़े-खड़े और कर भी क्या सकता था. भूषण जाकर मेघा से मिलता है, जो अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थी. उस भीड़ से थोड़ा कटकर दोनों बात करने लगते हैं. मेघा बात करते हुए एक बार मेरी तरफ़ मुड़कर देखती है, मैं हाथ हिलाकर ‘हाय’ कहता हूँ. दूर से उसके हाव-भाव का पता नहीं चल पा रहा था, पर मेरे ‘हाय’ का जब उसने कोई उत्तर न दिया, तब संशय हुआ, लगा जैसे कुछ गड़बड़ है. कुछ और देर बात करके भूषण मेरी तरफ़ आने लगता है, और मेघा वापस अपनी सहेलियों के साथ हो लेती है. भूषण को आता देख, मुझे निराशा के बादल अपने सर के ऊपर उमड़ते हुए दिखे. मन ही मन कहा, ‘ये आख़िरी कोशिश भी नाकाम साबित होगी.’